Bhagwad geeta chapter 3 (Part-2) shloka 09-16

 Shreemad Bhagwad Geeta chapter 3 (Part-2) shloka 09-16

Shreemad Bhagwad Geeta chapter 3  shloka 09-16

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Chapter-3  

तृतीयोअध्याय ~ कर्मयोग



    Geeta chapter 3 (Part-2) 
    shloka 09-16

    यज्ञ(कर्तव्यपालन) के लिए किये गये कर्मो की आवश्यकता
    (Need of karma(deeds) to follow your duties)

    गीता  अध्याय 3 श्लोक 09 | geeta chapter 3 shloka 09

    यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः ।
    तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर ॥3.09
    yajñārthātkarmaṇō'nyatra lōkō'yaṃ karmabaṃdhanaḥ ।
    tadarthaṃ karma kauntēya muktasaṃgaḥ samācara ॥
    Meaning: Work done as a sacrifice for god or your duties has to be performed, otherwise work binds one to this material world. Therefore, 0 son of Kunti, perform your prescribed duties for His satisfaction, and in that way you will always remain unattached and free from bondage.
    भावार्थ: यज्ञ(कर्तव्य पालन) के लिए किये गये कर्मो से अन्यत्र(अपने लिए किये गये) कर्मो में लगा हुआ यह मनुष्य समुदाय कर्मो से बंधता है इसलिए हे कौन्तेय! तु आसक्तिरहित होकर उस यज्ञ के लिए ही कर्म को कर

    गीता  अध्याय 3 श्लोक 10  11 | geeta chapter 3 shloka 10 11

    सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाचप्रजापतिः ।
    अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्‌ ॥3.10
    sahayajñāḥ prajāḥ sṛṣṭā purōvācaprajāpatiḥ । anēna prasaviṣyadhvamēṣa vō'stviṣṭakāmadhuk‌ ॥
    देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
    परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥3.11
    dēvānbhāvayatānēna tē dēvā bhāvayantu vaḥ ।
    parasparaṃ bhāvayantaḥ śrēyaḥ paramavāpsyatha
    Meaning: In the beginning of creation, the Lord of all creatures sent forth generations of men and demigods, along with sacrifices for your duties, and blessed them by saying, "Be thou happy by this yajna [sacrifice] because its performance will bestow upon you all desirable things." The demigods, being pleased by sacrifices, will also please you thus nourishing one another, there will reign general prosperity for all.
    भावार्थ: प्रजापति ब्रह्माजी ने सृष्टि के आदिकाल से ही कर्ताव्यकर्मोके विधानसहित प्रजा की रचना करके कहा की तुम(मनुष्य आदि) लोग इस कर्तव्य के द्वारा सबकी वृद्धि करो और यह कर्तव्य कर्मरूपी यज्ञ तुम लोगो को कर्तव्य पालन की आवश्यक सामग्री प्रदान करने वाला हो

    गीता  अध्याय 3 श्लोक 12 | geeta chapter 3 shloka 12

    इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः । तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः ॥3.12
    iṣṭānbhōgānhi vō dēvā dāsyantē yajñabhāvitāḥ । tairdattānapradāyaibhyō yō bhuṃktē stēna ēva saḥ ॥
    Meaning: in charge of the various necessities of life, the demigods, being satisfied by the performance of yajna[sacrifice], supply all necessities to man. But he who enjoys these gifts, without offering them to the demigods in return, is certainly a thief.
    भावार्थ: यज्ञ से पुष्ट हुए देवता भी तुम लोगो को कर्तव्यपालन हेतु आवश्यक सामग्री देते रहेंगे इस प्रकार उन देवताओं की दी हुई सामग्री को दुसरो की सेवा में लगाये बिना ही जो मनुष्य स्वयं उसका उपभोग करता है, वह चोर ही है

    गीता  अध्याय 3 श्लोक 13 | geeta chapter 3 shloka 13

    यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः । भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्‌ ॥3.13
    yajñaśiṣṭāśinaḥ santō mucyantē sarvakilbiṣaiḥ । bhuñjatē tē tvaghaṃ pāpā yē pacantyātmakāraṇāt‌ ॥
    Meaning: The devotees of the. Lord are released from all kinds of sins because they eat food which is offered first for sacrifice. Others, who prepare food for personal sense enjoyment, verily eat only sin.
    भावार्थ: यज्ञशेष का अनुभव करने वाले श्रेष्ट मनुष्य सम्पूर्ण पापो से मुक्त हो जाते है परन्तु जो अपने लिए ही पकाते है अर्थात् सब कर्म करते है । वे पापी लोग तो पाप का ही भक्षण करते है

    गीता  अध्याय 3 श्लोक 14 15 | geeta chapter 3 shloka 14 15

    अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥3.14
    annādbhavanti bhūtāni parjanyādannasambhavaḥ । yajñādbhavati parjanyō yajñaḥ karmasamudbhavaḥ ॥
    कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्‌ ।
    तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्‌ ॥3.15
    karma brahmōdbhavaṃ viddhi brahmākṣarasamudbhavam‌ ।
    tasmātsarvagataṃ brahma nityaṃ yajñē pratiṣṭhitam‌ ॥
    Meaning: All living bodies subsist on food grains, which are produced from rains. Rains are produced by the performance of yajna [sacrifice], and yajna is born of prescribed duties. Regulated activities are prescribed in the Vedas, and the Vedas are directly manifested from the Supreme Personality of Godhead. Consequently, the all-pervading Transcendence is eternally situated in acts of sacrifice.
    भावार्थ: सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते है, अन्न की उत्पति वर्षा से होती है वर्षा यज्ञ से होती है यज्ञ कर्मो से संपन्न होता है कर्मो को तु वेद से उत्पन्न जन और वेद को अक्षर ब्रह्म से उत्पन्न हुआ जान इसलिए वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ(कर्त्तव्य-कर्म) में नित्य स्थित है

    गीता  अध्याय 3 श्लोक 16 | geeta chapter 3 shloka 16

    एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
    अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥3.16
    ēvaṃ pravartitaṃ cakraṃ nānuvartayatīha yaḥ ।
    aghāyurindriyārāmō mōghaṃ pārtha sa jīvati ॥
    Meaning: My dear Arjuna, a man who does not follow this prescribed Vedic system of sacrifice certainly leads a life of sin, for a person delighting only in the senses lives in vain.
    भावार्थ: हे पार्थ! जो मनुष्य इस लोक इस प्रकार प्रचलित सृष्टिचक्र के अनुसार नही चलता है वह इन्द्रियों के द्वारा भोगो में रमण करने वाला अघायु(पापमय जीवन बिताने वाला) मनुष्य संसार में व्यर्थ ही जीता है

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