100+ Sanskrit Shlok with Meaning

100+ Sanskrit Shlok with Meaning in Hindi and English

Sanskrit Shlok


Sanskrit is the ancient and oldest language of the world. it is also said that Sanskrit is the mother of all languages. the oldest books and text are Ved that are written in the Sanskrit language.
The Ramayan and The Mahabharat are written in Sanskrit. 
we are providing you the 100 Sanskrit Shlok to read and get an understanding of it. these Sanskrit Shlok are taken from various Sanskrit texts.
We have also provided transliteration of these shlokas so that you can know how to pronounce these Sanskrit shlokas.
संस्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषा है इसे समस्त भाषाओ की जननी कहा जाता है . सभी वेद हमें संस्कृत भाषा में ही मिलते है . रामायण एवं महाभारत आदि महाकाव्य भी संस्कृत में ही लिखे गये है .

हम आपको इस लेख में अलग अलग संस्कृत ग्रंथो से लिए गये 100 संस्कृत श्लोक उनके अर्थ सहित उपलब्ध करवा रहे है जिससे आप आसानी से उनके अर्थ को समझ सकते है .





    Sanskrit Shlok 01-25 | संस्कृत श्लोक ०१-२५

    Sanskrit Shlok 1

    सत्यमेवेश्वरो लोके सत्यं पद्माश्रिता सदा।
    सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम्।।
      - Valmiki Ramayan 2.109.13
    satyamēvēśvarō lōkē satyaṃ padmāśritā sadā।
    satyamūlāni sarvāṇi satyānnāsti paraṃ padam।।
    Meaning: Truth is God. The goddess of wealth always takes refuge in truth. Truth is the root of everything. It is supreme and there is nothing above it.
    भावार्थ: सत्य से ही ईश्वर की प्राप्ति होती है, सत्य से ही लक्ष्मी-धन धान्य मिलता है, सत्य ही सभी सुखों का मूल है, सत्य से बढ़कर और कोई वस्तु नहीं है, जिसका आश्रय लिया जाए।

    Sanskrit Shlok 2

    शरीरस्य गुणानाश्च दूरम्अन्त्य अन्तरम् ।⁣⁣
    शरीरं क्षणं विध्वंसि कल्पान्त स्थायिनो गुणा: ।।⁣⁣ - Chankya Niti
    śarīrasya guṇānāśca dūramantya antaram ।⁣⁣
    śarīraṃ kṣaṇaṃ vidhvaṃsi kalpānta sthāyinō guṇā: ।।⁣⁣
    Meaning: There is a lot of difference between the human body and its qualities. Because the Human body lives for a short period whereas the Qualities are remembered forever.⁣⁣
    भावार्थ:  ⁣⁣शरीर और गुण इन दोनों में बहुत अन्तर है । शरीर थोड़े ही दिनों का मेहमान होता है जबकि गुण प्रलय काल तक बने रहते हैं ।⁣⁣

    Sanskrit Shlok 3

    किमप्यस्ति स्वभावेन सुन्दरं वाप्यसुन्दरम् ।
    यदेव रोचते यस्मै तद्भवेत्तस्य सुन्दरम् ॥ -  Source - Hitopadesh
    kimapyasti svabhāvēna sundaraṃ vāpyasundaram ।
    yadēva rōcatē yasmai tadbhavēttasya sundaram ॥
    Meaning: Is there anything that is beautiful or ugly inherently? Whatever appeals to whomever, looks beautiful to him.
    भावार्थ: किसी भी वस्तु की सुन्दरता और कुरूपता का कारण उसके स्वभावगुण कहाँ होते है, जो जिसको प्रिय है, वही उसको सुन्दर प्रतीत होती है।

    Sanskrit Shlok 4

    धान्यानामुत्तमं दाक्ष्यं धनानामुत्तमं श्रुतम् ।
    लाभानां श्रेय आरोग्यं सुखानां तुष्टिरुत्तमा ॥ - Source - Mahabharat vanparva
    dhānyānāmuttamaṃ dākṣyaṃ dhanānāmuttamaṃ śrutam ।
    lābhānāṃ śrēya ārōgyaṃ sukhānāṃ tuṣṭiruttamā ॥
    Meaning: Skill is superior to material things knowledge is superior to wealth. Health is superior to profits and contentment is the best form of happiness.
    भावार्थ:अन्नों में उत्तम निपुणता है। धनों में उत्तम शास्त्र-ज्ञान है। लाभों में उत्तम नीरोग (उत्तम स्वास्थ्य) है। सुखों में उत्तम सन्तोष है।

    Sanskrit Shlok 5

    गोपायितारं दातारं धर्मनित्यमतन्द्रितम्।
    अकामद्वेषसंयुक्तमनुरज्यन्ति मानवाः।। - सुभाषितरत्नभाण्डागारम्
    gōpāyitāraṃ dātāraṃ dharmanityamatandritam।
    akāmadvēṣasaṃyuktamanurajyanti mānavāḥ।।
    Meaning: People love the king‌ who protects them, gives charity, is devoted to Dharma,is wide awake, and is free from lust and hatred.
    भावार्थ: लोग उस राजा के प्रति स्नेह रखतेे हैं, जो उनकी रक्षा करता है, दान देता है, धर्म के प्रति समर्पित है, व्यापक जागृत है, और वासना, घृणा से मुक्त है।

    Sanskrit Shlok 6

    जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यं मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
    चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम्॥
    jāḍyaṃ dhiyō harati siṃcati vāci satyaṃ mānōnnatiṃ diśati pāpamapākarōti
    cētaḥ prasādayati dikṣu tanōti kīrtiṃ satsaṃgatiḥ kathaya kiṃ na karōti puṃsām॥
    भावार्थ: उत्तम मित्रों का साथ बुद्धि की जड़ता को हर लेता है। हमारी वाणी में सत्यता आती है। हमारा मान-सम्मान बढ़ता है। हम पापकर्म से मुक्त होते हैं। हमारा मन प्रसन्न होता है, और हमारा यश चारों दिशाओं में फैलता है। उत्तम और श्रेष्ठ मित्रों की संगति से मानव का हर प्रकार से कल्याण होता है।
    Meaning: Good friends make you wise, honest, make one respectable and keeps one away from sins. Makes happy and famous. Good company gives a man everything in life that he could ask for.

    Sanskrit Shlok 7

    क्रोधः प्रीतिं प्रणाशयति मानो विनयनाशनः ।
    माया मित्त्राणि नाशयति लोभः सर्वविनाशनः ॥
    krōdhaḥ prītiṃ praṇāśayati mānō vinayanāśanaḥ ।
    māyā mittrāṇi nāśayati lōbhaḥ sarvavināśanaḥ ॥
    Meaning:  Anger destroys love, pride destroys modesty, hypocrisy destroys friendship, while avarice destroys everything.
    भावार्थ: क्रोध प्रेम को नष्ट कर देता है, अभिमान विनय को नष्ट कर देता है, पाखंड मित्रता को नष्ट कर देता है, जबकि लोभ(लालच) सब कुछ नष्ट कर देता है।

    Sanskrit Shlok 8

    भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।
    कालो न यातो वयमेव याताः तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ॥ - भर्तृहरि (वैराग्यशतकम्)
    bhōgā na bhuktā vayamēva bhuktāḥ tapō na taptaṃ vayamēva taptāḥ ।
    kālō na yātō vayamēva yātāḥ tṛṣṇā na jīrṇā vayamēva jīrṇāḥ ॥
    भावार्थ: भोगों को हमने नहीं भोगा, बल्कि उन्होंने हमें भोग लिया। तपस्या हमने नहीं की,बल्कि हम स्वयं तप गए। काल कहीं नहीं गया बल्कि हम चले गए । तृष्णा नहीं गयी बल्कि हम जीर्ण हो गए।
    Meaning: Desires were not devoured but we ourselves were devoured, penance was not observed we ourselves were made to suffer, time did not pass we ourselves became aged, hungers were not sated we ourselves were digested.

    Sanskrit Shlok 9

    नात्यन्त गुणवत् किञ्चित नाचाप्यत्यन्तनिर्गुणम् ।
    उभयं सर्वकार्येषु दृष्यते साध्वासाधुवा ॥
    nātyanta guṇavat kiñcita nācāpyatyantanirguṇam ।
    ubhayaṃ sarvakāryēṣu dṛṣyatē sādhvāsādhuvā ॥
    Meaning: There is no work which is good in all respects, nor bad in all respects Both good and bad exist in every work.
    भावार्थ: ऐसा कोई भी कार्य नही है, जो सर्वदा अच्छा हो, या सर्वदा बुरा हो, अच्छे और बुरे गुण तो प्रत्येक कार्य में होते ही है।


    Sanskrit Shlok 10

    कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्मा: सनातना:
    धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥  -   Shrimad Bhagavad Gita 1.40
    kulakṣayē praṇaśyanti kuladharmā: sanātanā:
    dharmē naṣṭē kulaṃ kṛtsnamadharmō'bhibhavatyuta ॥
    भावार्थ:  कुल के नाश से सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, धर्म के नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत
    फैल जाता है।
    Meaning: Age-long family traditions disappear with the destruction of a family; and virtue having been lost, vice takes hold of the entire race.


    Sanskrit Shlok 11

    आचाराल्लभते धर्मम् आचाराल्लभते धनम् । 
    आचाराच्छ्रियमाप्नोति आचारो हन्त्यलक्षणम् ॥  - Mahasubhashitsangrah
    ācārāllabhatē dharmam ācārāllabhatē dhanam । 
    ācārācchriyamāpnōti ācārō hantyalakṣaṇam ॥
    भावार्थ:  सदाचार से ही धर्म की प्राप्ति होती है, सदाचार से ही धन की प्राप्ति होती है, सदाचार से ही उच्च स्थान प्राप्त होता है, सदाचार से ही अशुभ लक्षणों का नाश होता है।
    Meaning: Through good conduct one attains Dharma; through good conduct one attains wealth; through good conduct one attains a High position; good conduct scares bad luck away.

    Sanskrit Shlok 12

    सर्वं परवशं दुःखं सर्वं आत्मवशं सुखम् ।
    एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः।। -  - मनुस्मृतिः
    sarvaṃ paravaśaṃ duḥkhaṃ sarvaṃ ātmavaśaṃ sukham ।
    ētadvidyātsamāsēna lakṣaṇaṃ sukhaduḥkhayōḥ।। 
    भावार्थ:  जो सब दूसरों के वश में होता है, वह दुख है। और जो सब अपने वश में होता है, वह सुख है। यही संक्षेप में सुख एवं दुख का लक्षण है।
    Meaning: Everything that is in other's control is painful. all that is in self- control is happiness. This is the definition of happiness and pain in short.

    Sanskrit Shlok 13

    उप्तं सुकृतबीजं हि सुक्षेत्रेषु महाफलम् ।  -कथासरित्सागर
    uptaṃ sukṛtabījaṃ hi sukṣētrēṣu mahāphalam ।
    भावार्थ:  सही स्थान पर बोया गया सुकर्म का बीज ही महान् फल देता है।
    Meaning: The seed of good works, sown in the right place gives great results.

    Sanskrit Shlok 14

    आखुभ्यः किं खलैर्ज्ञातं खलेभ्यश्च किमाखुभिः ।
    अन्यत्परगृहत्खातात्कर्म येषां न विद्यते ॥  - Mahasubhashitsangrah
    ākhubhyaḥ kiṃ khalairjñātaṃ khalēbhyaśca kimākhubhiḥ ।
    anyatparagṛhatkhātātkarma yēṣāṃ na vidyatē ॥
    Meaning: Did the wicked learn from mice or did mice learn from the wicked ? Both do nothing else than to undermine the houses of others.
    भावार्थ:  क्या चूहा दुष्ट व्यक्ति से सीखता है, या दुष्ट व्यक्ति चूहे से, क्योंकि दोनों ही दूसरों के घर को क्षति(हानि) पहुंचाने के अलावा और कुछ नहीं करते।

    Sanskrit Shlok 15

    लोके कुलं कुलं तावद्यावत्पूर्वसमन्वयः ।
    गुणप्रभावे विच्छिन्ने समाप्तं सकलं कुलम् ॥  - दर्पदलनम् 1.10
    lōkē kulaṃ kulaṃ tāvadyāvatpūrvasamanvayaḥ ।
    guṇaprabhāvē vicchinnē samāptaṃ sakalaṃ kulam ॥
    भावार्थ:  संसार में कुल(परिवार) तब तक कुल(परिवार) है, जब तक पूर्वजों के साथ समानता(अनुकूलता) है । गुणों का प्रभाव नष्ट हो जाने पर सारा कुल(परिवार) समाप्त हो जाता है।
    Meaning: In this world a family is a family as long as there is compatibility with ancestors.
    When the influence of values is lost, the family comes to nought.

    Sanskrit Shlok 16

    कुलीनमकुलीनं वा वीरं पुरुषमानिनम्।
    चारित्रमेव व्याख्याति शुचिं वा यदि वाऽशुचिम्।। - Valmiki Ramayana (2.109.4)
    kulīnamakulīnaṃ vā vīraṃ puruṣamāninam।
    cāritramēva vyākhyāti śuciṃ vā yadi vā'śucim।।
    Meaning: It is only the character that tells whether a man is highborn or not, brave or only 
    proud of his manliness, honest or dishonest.
    भावार्थ:  चरित्र ही अकुलीन को कुलीन, भीरू(कायर) को वीर , और अपावन को पावन सिद्ध करता है।

    Sanskrit Shlok 17

    दीर्घा वै जाग्रतो रात्रिः दीर्घ श्रान्तस्य योजनम् ।
    दीर्घो बालानां संसारः सद्धर्मं अविजानताम् ॥
    dīrghā vai jāgratō rātriḥ dīrgha śrāntasya yōjanam ।
    dīrghō bālānāṃ saṃsāraḥ saddharmaṃ avijānatām ॥
    भावार्थ:  जो रात्री भर जगा हो, उसे रात्री बहुत बड़ी प्रतीत होती है। जो चलकर थक गया हो, उसको केवल एक योजन की दुरी भी बहुत दूर लगती है। उसी प्रकार जिन्हें सद्धर्म (उत्तम धर्म) का ज्ञान नही है, उन्हें जीवन बहुत दीर्घ लगता।
    Meaning: Night appears very long to the one who is awake all through the night and the short distance of a yojana appears very long to the one who is tired. Similarly, life appears long to small minded people who do not know what true dharma is.  

    Sanskrit Shlok 18

    चरेद्धानकटुको मुञ्चेत् स्नेहं न नास्तिकः । 
    अनृशंसश्चरेदर्थं चरेत्  काममनुद्धतः ॥ - Mahasubhashitsangrah
    carēddhānakaṭukō muñcēt snēhaṃ na nāstikaḥ । 
    anṛśaṃsaścarēdarthaṃ carēt  kāmamanuddhataḥ ॥
    Meaning: One should do righteous acts without being bitter, give up attachment without being an atheist, earn material prosperity without being cruel, and enjoy carnal pleasure without being reckless.
    भावार्थ: बिना कटु(बुरा) हुऐ धर्मकार्य करें , नास्तिक बनेे बिना बंधनों का त्याग करें , क्रूर बनें बिना भौतिक समृद्धि अर्जित करें और लापरवाह हुए बिना सुख प्राप्त करें।

    Sanskrit Shlok 19

    सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः।
    संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्॥  -  महाभारतम्- -स्त्रीपर्व
    sarvē kṣayāntā nicayāḥ patanāntāḥ samucchrayāḥ।
    saṃyōgā viprayōgāntā maraṇāntaṃ ca jīvitam॥
    Meaning: All things will ultimately get destroyed, what rises comes down.
    All unions end in separation, all lives end in death.
    भावार्थ: सारे संग्रहों का अंत उनके क्षय में ही है। भौतिक उन्नतियों का अंत पतन में ही है। सारे संयोगों का अंत वियोग में ही है। इसी प्रकार संपूर्ण जीवन का अंत मृत्यु में ही होने वाला है।

    Sanskrit Shlok 20

    अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम् ।
    शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ॥ - Mahabharat, Vanparva
    ahanyahani bhūtāni gacchantīha yamālayam ।
    śēṣāḥ sthāvaramicchanti kimāścaryamataḥ param ॥ 
    भावार्थ: प्रतिदिन अनेक जीवात्माएं यमलोक जाती हैं अर्थात उनकी मृत्यु होती है, तब भी शेष अमर होने की इच्छा रखते हैं, इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है !
    Meaning: Every day, beings go to the abode of yama (death). The rest desire for immortality. What can be more astonishing than this?

    Sanskrit Shlok 21

    कालोऽयं विलयं याति भूतगर्ते क्षणे क्षणे । 
    स्मृतयस्त्ववशिष्यन्ते जीवयन्ति मनांसि न: ।।
    kālō'yaṃ vilayaṃ yāti bhūtagartē kṣaṇē kṣaṇē । 
    smṛtayastvavaśiṣyantē jīvayanti manāṃsi na: ।।
    भावार्थ: प्रत्येक क्षण, समय अतीत की खाई में गायब हो जाता है, केवल स्मृतियाँ(यादें) रह जाती हैं, और वे सदैव हमारे मन को सजीव रखती हैं।"
    Meaning: Every moment, the time disappears in the ditch of the past. Only memories remain and they enliven our minds.

    Sanskrit Shlok 22

    पापान्निवारयति योजयते हिताय
    गुह्यं निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति ।
    आपद्गतं च न जहाति ददाति काले
    सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः ॥
    pāpānnivārayati yōjayatē hitāya
    guhyaṃ nigūhati guṇān prakaṭīkarōti ।
    āpadgataṃ ca na jahāti dadāti kālē
    sanmitralakṣaṇamidaṃ pravadanti santaḥ ॥
    Meaning: He restrains his friend from committing sins, and induces him to do good deeds. He conceals the unseemly secrets of a friend, projecting only his good qualities. He does not desert his friend in difficulties but gives timely assistance. Saints describe these as the characteristics of a true friend.
    भावार्थ: जो पाप से रोकता है, हित में जोडता है, गुप्त बात गुप्त रखता है, गुणों को प्रकट करता है, आपत्ति आने पर छोडता नहीं, समय आने पर (जो आवश्यक हो) देता है - संत पुरुष इन्हीं को सन्मित्र के लक्षण कहते हैं।

    Sanskrit Shlok 23

    अन्तो नास्ति पिपासायाः सन्तोषः परमं सुखम् । 
    तस्मात्सन्तोषमेवेह परं पश्यन्ति पण्डिताः ॥ -  Mahabharata Vanaparva
    antō nāsti pipāsāyāḥ santōṣaḥ paramaṃ sukham । 
    tasmātsantōṣamēvēha paraṃ paśyanti paṇḍitāḥ ॥ 
    भावार्थ: तृष्णा अनंत है, और संतोष परम् सुख है । इस लिए विद्वज्जन संतोष को ही इस संसार में श्रेष्ठ समझते हैं ।
    Meaning: There is no limit for greed, and contentment is the ultimate happiness, so a wise man is always happy with what he has.

    Sanskrit Shlok 24

    पूर्वे वयसि यः शान्तः स शान्त इति मे मतिः ।
    धातुषु क्षीयमाणेषु शमः कस्य न जायते ॥ -  पञ्चतंत्र मित्रभेद
    pūrvē vayasi yaḥ śāntaḥ sa śānta iti mē matiḥ ।
    dhātuṣu kṣīyamāṇēṣu śamaḥ kasya na jāyatē ॥ 
    Meaning: I consider a person as calm only when he is calm at a young age. When one is old and capabilities diminished, who is not calm?
    भावार्थ: जो प्रथम(युवा) अवस्था में शांत है, वही शांत है, ऐसा मेरा मत (मानना) है, धातुओं के क्षीण हो जाने के समान वृद्धावस्था में कौन शांत नहीं होता है।

    Sanskrit Shlok 25

    अपि मृद्व्या गिरा लभ्यः सदा जागर्त्यतन्द्रितः । 
    नास्ति धर्मसमो भृत्यः किंचिदुक्तस्तु धावति ॥  - Mahasubhashitsangrah
    api mṛdvyā girā labhyaḥ sadā jāgartyatandritaḥ । 
    nāsti dharmasamō bhṛtyaḥ kiṃciduktastu dhāvati ॥
    Meaning: There is no servant equals to Dharma, who comes in through gently called, ever vigilant without sloth and runs the errand by a little speech.
    भावार्थ:  धर्म के समान कोई भी सेवक नहीं है, जो धीरे से पुकारने पर आ जाता है, आलस्य के बिना सदैव जाग्रत रहता है, और छोटे से भाषण से अपने कार्य(संदेश) को बढ़ाता है।

    Sanskrit Shlok 26-50 | संस्कृत श्लोक २६-५०

    Sanskrit Shlok 26

    मित्रवान्साधयत्यर्थान्दुःसाध्यानपि वै यतः।
    तस्मान्मित्राणि कुर्वीत समानान्येव चात्मनः।। -  पञ्चतंत्र मित्रसंप्राप्ति
    mitravānsādhayatyarthānduḥsādhyānapi vai yataḥ।
    tasmānmitrāṇi kurvīta samānānyēva cātmanaḥ।। 
    भावार्थ:  मित्रों वाला व्यक्ति कठिन से कठिन कार्यों को भी (मित्र की सहायता से) सिध्द कर लेता है। अतः अपने अनुकुल मित्र अवश्य बनाना चाहिए।
    Meaning: As a man having a friend can accomplish even the most difficult things,
    one should always develop friendship with equal minded ones.

    Sanskrit Shlok 27

    मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि।
    किवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत्॥ -  अष्टावक्रगीता
    muktābhimānī muktō hi baddhō baddhābhimānyapi।
    kivadantīha satyēyaṃ yā matiḥ sā gatirbhavēt॥
    भावार्थ: स्वयं को मुक्त मानने वाला मुक्त ही है, और बद्ध मानने वाला बंधा हुआ ही है, यह कथन सत्य ही है, कि जैसी बुद्धि होती है, वैसी ही गति होती है।
    Meaning: If one thinks of oneself as free, one is free, and if one thinks of oneself as bound, one is bound. Here this saying is true, "Thinking makes it so".

    Sanskrit Shlok 28

    अकर्तव्यं न कर्तव्यं प्राणैः कण्ठगतैरपि । 
    कर्तव्यमेव कर्तव्यं प्राणैः कण्ठगतैरपि ॥ - Subhashitratnabhandagaram
    akartavyaṃ na kartavyaṃ prāṇaiḥ kaṇṭhagatairapi । 
    kartavyamēva kartavyaṃ prāṇaiḥ kaṇṭhagatairapi ॥
    Meaning: Whatever is not right to be done, must never be done even on pain of death; and what is right to do, must be done even if one should die for the same.
    भावार्थ: जो कार्य निषिद्ध है, उसे प्राण कण्ठगत (मृत्यु संकट उपस्थित होने की स्थिति) पर भी नहीं करना चाहिये। जो कर्तव्य है, उसे अपने प्राण की परवाह न करते हुये भी अवश्य करना चाहिये।

    Sanskrit Shlok 29

    गौरवं गुरुषु स्नेहं नीचेषु प्रेम बन्धुषु।
    दर्शयन् विनयी धर्मी सर्वप्रीतिकरो भवेत् ॥  - Subhashitratnabhandagaram
    gauravaṃ guruṣu snēhaṃ nīcēṣu prēma bandhuṣu।
    darśayan vinayī dharmī sarvaprītikarō bhavēt ॥
    Meaning: A modest and virtuous person who tenders regards to the elders, affection to the lowly and love to his kinsmen, is loved by all.
    भावार्थ: एक विनम्र और सदाचारी व्यक्ति जो अपने से बड़ों के प्रति प्रेम, छोटे के प्रति स्नेह और अपने परिजनों के प्रति प्रेम भाव रखता है, सभी को प्रिय है। 

    Sanskrit Shlok 30

    कराविव शरीरस्य नेत्रयोरिव पक्ष्मणी।
    अविचार्य प्रियं कुर्यात्तन्मित्रं मित्रमुच्यते।।  - सुभाषितरत्नभाण्डागारम् 
    karāviva śarīrasya nētrayōriva pakṣmaṇī।
    avicārya priyaṃ kuryāttanmitraṃ mitramucyatē।।
    भावार्थ: जैसे दोनों हाथ शरीर का बिना विचारे हित करते हैं, दोनों पलकें आँखों का बिना विचारे ध्यान रखती हैं, वैसे ही जो मित्र, मित्र का बिना विचारे प्रिय करता है वही मित्र (वास्तव में) मित्र होता है।
    Meaning: He alone is your true friend who serves you spontaneously (without being prompted by a motive), like the hands serving the body and the eyelashes serving the eyes.

    Sanskrit Shlok 31

    यथा भूमिः तथा तोयं, यथा बीजं तथाङ्कुरः।
    यथा देशः तथा भाषा, यथा राजा तथा प्रजा॥ -  (वैद्यकीय-सुभाषितम्)
    yathā bhūmiḥ tathā tōyaṃ, yathā bījaṃ tathāṅkuraḥ।
    yathā dēśaḥ tathā bhāṣā, yathā rājā tathā prajā॥
    भावार्थ: जैसी भूमि होती है, वैसा ही पानी होता है। जैसा बीज होता है, वैसा ही अंकुर होता है। जैसा देश होता है, वहाँ के रहने वालों की वैसी भाषा होती है। जैसा राजा होता है, प्रजा भी वैसी ही होती है।
    Meaning: As the land so the groundwater is, As the seed so the sprout. As the country, so the language, As the king so the people are.

    Sanskrit Shlok 32

    आशायाः ये दासाः ते दासास्सर्वलोकस्य ।
    आशा येषां दासी तेषां दासायते लोकः ॥ - कवितामृतकूपः
    āśāyāḥ yē dāsāḥ tē dāsāssarvalōkasya ।
    āśā yēṣāṃ dāsī tēṣāṃ dāsāyatē lōkaḥ ॥
    Meaning: Those who are enslaved to desire, are enslaved to the whole world. But for those to whom desire is enslaved, to them, the entire world is enslaved.
    भावार्थ: जो लोग आशा के दास होते हैं वे सब लोगों के दास होते हैं। किन्तु आशा जिनकी दासी होती है, लोग उनके दास बनकर आचरण करते हैं।

    Sanskrit Shlok 33

    उपाध्यायान् दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता।
    सहस्रं तु पितॄन् माता गौरवेणातिरिच्यते॥ -  Manusmriti
    upādhyāyān daśācārya ācāryāṇāṃ śataṃ pitā।
    sahasraṃ tu pitn mātā gauravēṇātiricyatē॥ 
    Meaning: A preceptor is more than ten ordinary teachers, our father is superior to a hundred such preceptors, but our mother surpasses the glory of a thousand fathers.
    भावार्थ: दस उपाध्यायों से बढ़कर एक आचार्य होता है, सौ आचार्यों से बढ़कर पिता होता है, परन्तु पिता से हजार गुणा बढ़कर माता गौरवमयी होती है। (अतः माता का गौरव सर्वाधिक है।)

    Sanskrit Shlok 34

    न तत् मातापितरौ तत् कुर्यातां अन्ये चापि च ज्ञातिकाः।
    सम्यक्प्रणिहितं चित्तं श्रेयांसं एनं ततः कुर्यात् ॥   - Dharmpadam
    na tat mātāpitarau tat kuryātāṃ anyē cāpi ca jñātikāḥ।
    samyakpraṇihitaṃ cittaṃ śrēyāṃsaṃ ēnaṃ tataḥ kuryāt ॥
    Meaning: Neither mother, father, nor any other relative can do one greater good than one’s own well-directed mind.
    भावार्थ:  जितनी भलाई न माता-पिता कर सकते हैं, और न ही अन्य भाई बंधु , उससे कई अधिक सही मार्ग पर लगा चित्त(मन) कर सकता है।

    Sanskrit Shlok 35

    न स्थिरं क्षणमप्येकं उदकं तु यथोर्मिभिः ।
    वाताहतं तथा चित्तं तस्मात्तस्य न विश्वसेत् ॥  - दक्षस्मृति
    na sthiraṃ kṣaṇamapyēkaṃ udakaṃ tu yathōrmibhiḥ ।
    vātāhataṃ tathā cittaṃ tasmāttasya na viśvasēt ॥  
    Meaning:When there wind blowing the water does not stay still even for a second. Our mind is just like that. It will keep changing every second. Never trust it.
    भावार्थ:  जब हवा बहती है, तो पानी क्षण भर भी स्थिर नहीं रहता है। हमारा मन ऐसा ही है, यह प्रत्येक क्षण बदलता है, यह विश्वसनीय नहीं है।

    Sanskrit Shlok 36

    सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः ।
    अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ॥  -वाल्मीकि रामायण
    sulabhāḥ puruṣā rājan satataṃ priyavādinaḥ ।
    apriyasya tu pathyasya vaktā śrōtā ca durlabhaḥ ॥
    Meaning: O king, it is always easy to find men who speak pleasing words, but it is difficult to get a speaker and a listener who use words unpleasant (to the ears) but beneficial (in life).
    भावार्थ:  हे राजा! सदैव प्रिय भाषण करनेवाले सुलभ मिल जाते हैं, किंतु अप्रिय जो हितदायी हो ऐसा भाषण करनेवाले वक्ता एवं श्रोता, दोनों ही मिलना दुर्लभ होता है ।

    Sanskrit Shlok 37

    प्रदोषे दीपकश्चंद्र: प्रभाते दीपको रवि:।
    त्रैलोक्ये दीपको धर्म: सुपुत्र: कुलदीपक:॥
    pradōṣē dīpakaścaṃdra: prabhātē dīpakō ravi:।
    trailōkyē dīpakō dharma: suputra: kuladīpaka:॥
    Meaning: Moon illumines the evening. Sun illumines the morning. Dharma (Righteousness) illumines all the three worlds and a capable son illumines all ancestors.
    भावार्थ: शाम को चन्द्रमा प्रकाशित करता है, दिन को सूर्य प्रकाशित करता है, तीनों लोकों को धर्म प्रकाशित करता है और सुपुत्र पूरे कुल को प्रकाशित करता है।

    Sanskrit Shlok 38

    सत्यमेव परं मित्रं स्वीकृते सति मानवे ।
    सत्यमेव परं शत्रुः धिक्कृते सति मानवे ।।
    satyamēva paraṃ mitraṃ svīkṛtē sati mānavē ।
    satyamēva paraṃ śatruḥ dhikkṛtē sati mānavē ।।
    भावार्थ: यदि हम सत्य को स्वीकार करते है तो सत्य हमारा सबसे श्रेष्ठ मित्र बन जाता है। लेकिन अगर हम सत्य का स्वीकार न करके धिक्कारते है, तो जीवन में आगे चलकर वही सत्य हमारे लिए परं शत्रु बन जाता है।
    Meaning: If we accept truth then truth becomes our best friend. But if we do not accept the truth and admonish it, then later in life, the same truth becomes our enemy.

    Sanskrit Shlok 39

    नास्ति विद्यासमं चक्षु: नास्ति सत्यसमं तप:।
    नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्।।
    nāsti vidyāsamaṃ cakṣu: nāsti satyasamaṃ tapa:।
    nāsti rāgasamaṃ duḥkhaṃ nāsti tyāgasamaṃ sukham।।
    भावार्थ:  विद्या के समान कोई नेत्र नहीं, सत्य के समान कोई तप नहीं, आसक्ति (राग) के समान कोई दुःख नहीं और त्याग के समान कोई सुख नहीं है।
    Meaning: There is no eye like knowledge, no penance like truth, no sorrow like attachment and there is no happiness like a sacrifice.

    Sanskrit Shlok 40

    धन्या बधिरा अन्धाः स एव जीवन्ति मानुषे लोके ।
    न शृण्वन्ति पिशुनजनं खलानाम् ऋद्धिं न प्रेक्षन्ते ॥ -  सप्‍तशती
    dhanyā badhirā andhāḥ sa ēva jīvanti mānuṣē lōkē ।
    na śṛṇvanti piśunajanaṃ khalānām ṛddhiṃ na prēkṣantē ॥
    Meaning:  Blessed are those people who live in this world as deaf and blind, for, they do not have to listen to malicious words of the slanderers or see the prosperity of the evil.
    भावार्थ:  धन्य हैं वे लोग जो इस संसार में बहरे और अंधे के रूप में रहते हैं, क्योंकि उन्हें निंदकों के दुर्भावनापूर्ण शब्दों को नहीं सुनना या बुराई की समृद्धि को नहीं देखना पड़ता है।

    Sanskrit Shlok 41

    स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा ।
    सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम् ॥
    svabhāvō nōpadēśēna śakyatē kartumanyathā ।
    sutaptamapi pānīyaṃ punargacchati śītatām ॥
    Meaning: It is not possible to change a persons habits or nature by advice or instruction. Just like a well-heated drink always turns cold in the course of time.
    भावार्थ:  किसी के स्वभाव या आदत को सिर्फ सलाह देकर बदलना संभव नहीं है, जैसे पानी को गरम करने पर वह गरम तो हो जाता है, लेकिन पुनः स्वयं ठंडा हो जाता है।

    Sanskrit Shlok 42

    वनानि दहतो वह्नेः सखा भवति मारुतः ।
    स एव दीपनाषाय कृशे कस्यास्ति सौहृदम् ॥ -  Panchtantra
    vanāni dahatō vahnēḥ sakhā bhavati mārutaḥ ।
    sa ēva dīpanāṣāya kṛśē kasyāsti sauhṛdam ॥ 
    Meaning: For the fire that is burning forests, wind becomes a friend. The same (wind becomes) the cause in extinguishing a lamp. Who has affection for the weak?
    भावार्थ: अग्नि के वन जलाने में पवन उसका सखा(मित्र) बन जाता है, और दीपक का वही नाश करता है, दुर्बल के प्रति स्नेह किसे है? अर्थात दुर्बलता में कौन किसका मित्र होता है?

    Sanskrit Shlok 43

    शून्यमपुत्रस्य गृहं चिरशून्यं नास्ति यस्य सन्मित्रं।
    मूर्खस्य दिशाः शून्याः सर्वं शून्यं दरिद्रस्य ॥
    śūnyamaputrasya gṛhaṃ ciraśūnyaṃ nāsti yasya sanmitraṃ।
    mūrkhasya diśāḥ śūnyāḥ sarvaṃ śūnyaṃ daridrasya ॥
    Meaning: The house of a childless person is shoonya (void), for a person without a good friend it is forever void, the four quarters are void for the fool and for the poor everything is shoonya (void).
    भावार्थ: बच्चो के बिना घर सूना सूना लगता है,यदि कोई अच्छा दोस्त नही है तो हमेशा खालीपन महसूस होता है , मूर्ख के लिए तो चारो दिशायें शून्य ही समझो लेकिन दरिद्र व्यक्ति के लिए तो सारी दुनिया शून्य है।

    Sanskrit Shlok 44

    श्लोकेन वा तदर्धेन पादेनकाक्षरेण वा ।
    अबन्ध्यं दिवसं कुर्यात् ध्यानाध्ययन कर्मभिः।। -  चाणक्य नीति 
    ślōkēna vā tadardhēna pādēnakākṣarēṇa vā ।
    abandhyaṃ divasaṃ kuryāt dhyānādhyayana karmabhiḥ।। 
    Meaning: Every day, one should study a verse, or a half, or a quarter, or even a syllable. Never waste a day without contemplating and learning.
    भावार्थ:  मनुष्य को चाहिए कि प्रतिदिन एक श्लोक, आधा श्लोक, एक पाद अथवा एक अक्षर का स्वाध्याय करे और दान-अध्ययन आदि शुभकर्मों को करता हुआ ही दिन को सफल बनाए, दिन को व्यर्थ न गँवाए।

    Sanskrit Shlok 45

    यदेवोपनतं दुःखात् सुखं तद्रसवत्तरम् ।
    निर्वाणाय तरुच्छाया तप्तस्य हि विशेषतः ॥ -  विक्रमोर्वशीय
    yadēvōpanataṃ duḥkhāt sukhaṃ tadrasavattaram ।
    nirvāṇāya tarucchāyā taptasya hi viśēṣataḥ ॥
    Meaning: Attaining pleasure after being befallen with pain, is more opulent. The shadow of a tree is more comforting to the one afflicted by the heat of the Sun.
    भावार्थ:  दुःख से पीड़ित होने के पश्चात सुख अधिक भव्य होता है। पेड़ की छाया सूर्य की गर्मी से तप रहे व्यक्ति के लिए अधिक आरामदायक होती है।

    Sanskrit Shlok 46

    श्रुत्वा धर्म विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम्।
    श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात्॥ -  चाणक्य नीति 
    śrutvā dharma vijānāti śrutvā tyajati durmatim।
    śrutvā jñānamavāpnōti śrutvā mōkṣamavāpnuyāt॥
    भावार्थ:  सुनकर ही मनुष्य कोे धर्म का ज्ञान होता है, सुनकर ही वह दुर्बुद्धि का त्याग करता है । सुनकर ही उसे ज्ञान प्राप्त होता है, और सुनकर ही मोक्ष प्राप्त होता है ।
    Meaning: Only after hearing one understands dharma, malignity vanishes, He gets knowledge and attains salvation(Moksha) by listening.

    Sanskrit Shlok 47

    उपकाराच्च लोकानां निमित्तान्मृगपक्षिणाम् । 
    भयाल्लोभाच्च मूर्खाणां मैत्री स्याद् दर्शनात् सताम् ॥ - महासुभाषितसंग्रह
    upakārācca lōkānāṃ nimittānmṛgapakṣiṇām । 
    bhayāllōbhācca mūrkhāṇāṃ maitrī syād darśanāt satām ॥
    भावार्थ: लोगों के बीच सहायता से, पशुपक्षियों के बीच किसी हेतु से, मूर्खों के बीच भय और लोभ के कारण और सज्जनों के बीच (केवल) दर्शन से- मित्रता होती है।
    Meaning:The ordinary people are friendly by mutual help, the animals and birds become friends by special causes. The fools are made friends by fear and greed. and the good become friends by merely seeing one another.

    Sanskrit Shlok 48

    यदृच्छ्याऽप्युपनतं सकृतसज्जनसंङ्ग्तम् ।
    भवत्यजरमत्यन्तं नाभ्यासक्रममीक्षते ।।  -  पंचतंत्र-मित्रभेद
    yadṛcchyā'pyupanataṃ sakṛtasajjanasaṃṅgtam ।
    bhavatyajaramatyantaṃ nābhyāsakramamīkṣatē ।।
    भावार्थ: सज्जन मनुष्य का साथ, यदि अकस्मात संयोग से भी कभी प्राप्त हो जाता है, तो वह आजन्म मित्रता के रूप में अमर हो जाता है । वह पुनर्मिलन या आवागमन की अपेक्षा नहीं रखता है । .
    Meaning: The friendship of the good people even if accidentally occurs once, becomes permanent and does not perish. It does not require renewals again and again.

    Sanskrit Shlok 49

    कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दु:खमेकान्ततो वा।
    नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण।। - Kumarasambhavam
    kasyātyantaṃ sukhamupanataṃ du:khamēkāntatō vā।
    nīcairgacchatyupari ca daśā cakranēmikramēṇa।। 
    Meaning: There is none who is always happy and comfortable and none who is always unhappy and miserable. Happiness and sorrow alternate like the rim of a wheel that goes up and down.
    भावार्थ: किसने केवल सुख ही देखा है और किसने केवल दुःख ही देखा है, जीवन की दशा एक चलते पहिये के घेरे की तरह है जो क्रम से ऊपर और नीचे जाता रहता है।

    Sanskrit Shlok 50

    कृतस्य करणं नास्ति मृतस्य मरणं तथा ।
    गतस्य शोचनं नास्ति ह्येतद्वेदविदां मतम् ॥
    kṛtasya karaṇaṃ nāsti mṛtasya maraṇaṃ tathā ।
    gatasya śōcanaṃ nāsti hyētadvēdavidāṃ matam ॥
    Meaning: There is no doing of that which is (already) done; just as there is no death to the already dead. There is no sorrow for that which has passed - this is the opinion of those that are cognizant of the Vedas.
    भावार्थ: जो किया जा चुका है, उसको (उसी समय, स्थान व प्रकार) पुनः नहीं किया जा सकता । जो मृत हो गया है, उसको पुनः नहीं मारा जा सकता । जो बीत गया है, उसके लिए सोच-विचार करना व्यर्थ होता है, ऐसा शास्त्रज्ञाताओं का मत है ।

    Sanskrit Shlok 51-75 | संस्कृत श्लोक ५१-७५

    Sanskrit Shlok 51

    शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खाः,
    यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान्।
    सुचिन्तितं चौषधम् आतुराणां,
    न नाममात्रेण करोत्यरोगम्॥  - हितोपदेशः
    śāstrāṇyadhītyāpi bhavanti mūrkhāḥ,
    yastu kriyāvān puruṣaḥ sa vidvān।
    sucintitaṃ cauṣadham āturāṇāṃ,
    na nāmamātrēṇa karōtyarōgam॥
    भावार्थ: शास्त्रों का अध्ययन करने पर भी लोग मूर्ख रह जाते हैं। वस्तुतः वही विद्वान् है जो शास्त्रों के ज्ञान को व्यवहार में लाते हैं । जिस तरह औषधि लेने से रोगी रोगमुक्त होता है, न कि औषधि का नाम लेने मात्र से।
    Meaning: Even after studying the Shastras people remain ignorant. only those persons are learned who put knowledge into practice. Just as a patient is cured only by taking the prescribed medicine and not merely by mentioning it's name.

    Sanskrit Shlok 52

    सदयं हृदयं यस्य भाषितं सत्यभूषितम् ।
    कायं परहितं यस्य कलिस्तस्य करोति किम् ॥
    sadayaṃ hṛdayaṃ yasya bhāṣitaṃ satyabhūṣitam ।
    kāyaṃ parahitaṃ yasya kalistasya karōti kim ॥
    Meaning: He whose heart is filled with compassion, speech is adorned with truth. whose constitution form is for the benefaction of others - what can kali purusha do to him?
    भावार्थ: जिसके हृदय में दया है, जिसकी वाणी में सत्य है, जिसके कार्य भी दूसरो के हित के लिए है, उसका काल (मृत्यु) भी क्या करेगा अर्थात् ऐसे व्यक्ति को मृत्यु का भी भय नही होता।

    Sanskrit Shlok 53

    संसारकटुवृक्षस्य द्वे फले ह्यम्रृतोपमे । 
    सुभाषितरसास्वादः संगतिः सुजने जने ।।  - चाणक्य नीति 
    saṃsārakaṭuvṛkṣasya dvē phalē hyamrṛtōpamē । 
    subhāṣitarasāsvādaḥ saṃgatiḥ sujanē janē ।। 
    भावार्थ: इस संसार रूपी कटु वृक्ष के दो ही अमृत के समान फल हैं। सुभाषित का रसास्वादन और सज्जनों की संगति ।
    Meaning: This world is like a bitter tree, but there are two fruits of it which are like sweet ambrosia. 
    The listening of wise aphorisms and the company of good people.

    Sanskrit Shlok 54

    शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः ।
    दाक्षिण्यञ्चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः ॥
    śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayōḥ ।
    dākṣiṇyañcānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
    Meaning: The qualities of a true friend are: Purity, generosity, chivalry, being composed in happiness and distress, politeness, affection and truthfulness.‬
    भावार्थ: शुचिता (प्रामाणिकता), त्याग (औदार्य), शौर्य, सुख-दुःख में समरस होना, दक्षता, अनुराग, और सत्यता – यह सब मित्र के गुण हैं।‬‬ 

    Sanskrit Shlok 55

    दूरस्थोऽपि न दूरस्थो यो यस्य मनसि स्थितः ।
    यो यस्य हृदये नास्ति समीपस्थोऽपि दूरतः॥ 
    dūrasthō'pi na dūrasthō yō yasya manasi sthitaḥ ।
    yō yasya hṛdayē nāsti samīpasthō'pi dūrataḥ॥ 
    भावार्थ: जो व्यक्ति हृदय में रहता है, वह दूर होने पर भी दूर नहीं है । जो हृदय में नहीं रहता वह समीप रहने पर भी दूर है।
    Meaning: If one is physically very far away from you, they are very close to you as long as you have them in your heart. On the other hand, if a person is not in your heart he can be considered to be distant even if he physically close.

    Sanskrit Shlok 56

    मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णाः त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः ।
    परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यं निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः ॥ -  नीतिशतकम् 
    manasi vacasi kāyē puṇyapīyūṣapūrṇāḥ tribhuvanamupakāraśrēṇibhiḥ prīṇayantaḥ ।
    paraguṇaparamāṇūn parvatīkṛtya nityaṃ nijahṛdi vikasantaḥ santi santaḥ kiyantaḥ ॥ 
    भावार्थ: मन, वचन और शरीर में सत्कर्मरूपी अमृत से भरे हुए तीनों लोकों को अनेक उपकारों से सन्तुष्ट करनेवाले तथा दूसरे के लेशमात्र गुण को नित्य ही पर्वताकार (बहुत बड़ा) बनाकर अपने हृदय में प्रसन्न होनेवाले सज्जन (संसार में ) कुछ ही हैं (अथवा कितने हैं)?
    Meaning:  In the mind, speech and body, overflowing with the nectar of merits; pleasing all the three worlds with their rows of helping acts; always feeling gladness in the heart by extolling the minutest atom-like virtues of others as big as a mountain, and praising them everywhere’ How many men are noble like this?

    Sanskrit Shlok 57

    वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि।
    लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुम् अर्हति॥
    vajrādapi kaṭhōrāṇi mṛdūni kusumādapi।
    lōkōttarāṇāṃ cētāṃsi kō hi vijñātum arhati॥
    भावार्थ: विलक्षण मानवों के मन को समझना भला किस के वश में है, वे हीरे से भी कठोर हो सकते हैं और कभी पुष्प से भी कोमल ।
    Meaning: WHO CAN UNDERSTAND THE MINDS OF THE EXTRAORDINARY, WHICH ARE FIRMER THAN DIAMONDS AND AS TENDER AS FLOWERS!

    Sanskrit Shlok 58

    बुद्धिमान्मधुराभाषी पूर्वभाषी प्रियंवदः।
    वीर्यवान्न च वीर्येण महता स्वेन विस्मितः।।
    buddhimānmadhurābhāṣī pūrvabhāṣī priyaṃvadaḥ।
    vīryavānna ca vīryēṇa mahatā svēna vismitaḥ।।
    Meaning: Wise and softspoken, he(Sri Ram) was the first to speak to others words pleasing to hear. Though mighty, he was never proud of his overwhelming strength. .
    भावार्थ: राम बहुत बुद्धि सम्पन्न थे और सदा मधुर वाणी से बोलते थे। अपने समीप किसी काम से आये हुए मनुष्यों से स्वयं पहले बोलते थे और मीठा बोलते थे । बल और पराक्रम से सम्पन्न होने पर भी उन्हें अपनी शक्ति का गर्व कभी नहीं होता था ।

    Sanskrit Shlok 59

    गृहं गृहमटन् भिक्षुः शिक्षते न तु याचते ।
    अदत्वा मद्दृशो मा भूः दत्वा त्वं त्वद्दृशो भव ॥
    gṛhaṃ gṛhamaṭan bhikṣuḥ śikṣatē na tu yācatē ।
    adatvā maddṛśō mā bhūḥ datvā tvaṃ tvaddṛśō bhava ॥
    Meaning:  Roaming from home to home, the cadger is not begging but teaching:
    "Do not become like me, by not giving; but remain like yourself, by giving."
    भावार्थ: घर-घर घूमते हुए, भिक्षु भीख नहीं मांगता बल्कि शिक्षा देता है: " न देकर मेरे जैसे मत बनो, अतः अपने जैसे ही रहो, देकर।"

    Sanskrit Shlok 60

    मृगमीनसज्जनानां तृणजलसंतोषविहितवृत्तीनां ।
    लुब्धकधीवरपिशुना निष्कारणवैरिणो जगति 
    mṛgamīnasajjanānāṃ tṛṇajalasaṃtōṣavihitavṛttīnāṃ ।
    lubdhakadhīvarapiśunā niṣkāraṇavairiṇō jagati ॥
    Meaning: In this world, the deer remains happy by eating grass. The hunter hates it for no reason (and kills it). The fish remains happy by living inside the water. The fisher-man hates it for no reason (and kills it). The good man remains happy by contentment. The malicious hate him for no reason (and try to insult him always)!
    भावार्थ: इस संसार में जिस प्रकार हिरन अपनी घास खाकर खुश रहता है और शिकारी बिना किसी बात के उस से गृणा करता है इस प्रकार मछली जल में प्रसन्न रहती है परन्तु मछुआरा उससे घृणा करता है इसी प्रकार सज्जन पुरुष भी अपने आप में सनुष्ट रहते है परन्तु दुष्ट प्रवृति वाले लोग उससे बिना बात ही घृणा करते है

    Sanskrit Shlok 61

    यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
    यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रियाः -  मनुस्मति:
    yatra nāryastu pūjyantē ramantē tatra dēvatāḥ।
    yatraitāstu na pūjyantē sarvāstatrāphalā: kriyāḥ॥
    भावार्थ: जहाँ नारियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता प्रसन्न होते हैं। जहाँ उनका सम्मान नहीं होता, वहाँ सभी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं।
    Meaning: God rejoice the most where women are respected, where they are not respected, all the activities become useless.

    Sanskrit Shlok 62

    आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृध्दिमती च पश्चात् ।
    दिनस्य पूर्वार्धपरार्धभिन्ना छायेव मैत्रि: खलसज्जनानाम् ॥
    ārambhagurvī kṣayiṇī kramēṇa laghvī purā vṛdhdimatī ca paścāt ।
    dinasya pūrvārdhaparārdhabhinnā chāyēva maitri: khalasajjanānām ॥
    Meaning: Very strong in the beginning and decreasing in course of time very light in the beginning and becoming very strong later. the friendship of the bad and good people
    differ like the shadow of the first half and second half of the day.
    भावार्थ: दुर्जनों की मित्रता दिन के पूर्वार्द्ध में रहने वाली छाया की तरह प्रारम्भ से अधिक और फिर धीरे-धीरे कम होती रहती है एवं सज्जनों की मित्रता दिन के उत्तरार्ध की छाया की तरह पहले कम और फिर उत्तरोत्तर बढ़ने वाली होती है।

    Sanskrit Shlok 63

    गौरवं प्राप्यते दानात् न तु वित्तस्य सञ्चयात् ।
    स्थितिरुच्चैः पयोदानां पयोधीनामधः स्थितिः ॥
    gauravaṃ prāpyatē dānāt na tu vittasya sañcayāt ।
    sthitiruccaiḥ payōdānāṃ payōdhīnāmadhaḥ sthitiḥ ॥
    Meaning: Respectability comes from giving and not collecting. Clouds (attain) a higher position and the oceans, a lower one.
    भावार्थ: वित्त के संचय से नहीं अपितु दान से गौरव प्राप्त होता है। इसीलिए जल देनेवाले बादलों का स्थान, जल का समुच्चय करने वाले सागर से उच्च है।

    Sanskrit Shlok 64

    अभ्दि: गात्राणि शुध्यन्ति मन: सत्येन शुध्यति।‬
    ‪विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुध्दिज्ञाम्परानेन शुध्यति॥‬manusmriti
    abhdi: gātrāṇi śudhyanti mana: satyēna śudhyati।‬
    ‪vidyātapōbhyāṃ bhūtātmā budhdijñāmparānēna śudhyati॥
    Meaning: Senses are purified by water. Mind is purified by truth. Soul is purified by learning and penance. While intelligence is purified by knowledge.
    भावार्थ: शरीर के अंग जल से शुद्ध होते हैं । मन सत्य से शुद्ध होता हैं । आत्मा विद्या और तप से शुद्ध होता हैं और बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती हैं ।‬‬

    Sanskrit Shlok 65

    शरदि न वर्षति गर्जति वर्षति वर्षासु निःस्वनो मेघः।
    नीचो वदति न कुरुते न वदति सुजनः करोत्येव ॥ -  शार्गधरपद्धति:
    śaradi na varṣati garjati varṣati varṣāsu niḥsvanō mēghaḥ।
    nīcō vadati na kurutē na vadati sujanaḥ karōtyēva ॥
    भावार्थ: शरत् काल में बादल गरजता तो है किन्तु बरसता नहीं और वर्षा ऋतु में वह गरजता नहीं, अपितु बरसता है। उसी प्रकार नीच व्यक्ति कहता तो है किन्तु करता कुछ नहीं और सज्जन कहता तो कुछ नहीं, किन्तु करता अवश्य है।
    Meaning: The cloud does not rain in the autumn, it thunders only, but in the rainy season it rains without thunder. Likewise a wicked person only speaks and does nothing, while a noble man never speaks but acts only.

    Sanskrit Shlok 66

    यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महार्णवे।
    समेत्य च व्यपेयातां कालमासाद्य कञ्चन -  Valmiki Ramayan 
    yathā kāṣṭhaṃ ca kāṣṭhaṃ ca samēyātāṃ mahārṇavē।
    samētya ca vyapēyātāṃ kālamāsādya kañcana।।
    एवं भार्याश्चपुत्राश्च ज्ञातयश्च धनानि च।
    समेत्य व्यवधावन्ति ध्रुवो ह्येषां विनाभवः -  Valmiki Ramayana 
    ēvaṃ bhāryāścaputrāśca jñātayaśca dhanāni ca।
    samētya vyavadhāvanti dhruvō hyēṣāṃ vinābhavaḥ।।
    Meaning: In a mighty ocean, two pieces of logs meet one another, float together and in due course get separated. In the same way wives, sons, relatives and riches remain together for some time and thereafter get separated. Their separation is certain.
    भावार्थ: महासागर में बहते हुए लकड़ी के दो टुकड़े कभी एक दूसरे से मिल जाते हैं और कुछ समय तक साथ तैरते रह कर अलग हो जाते हैं । इसी प्रकार इस संसार में स्त्री, पुत्र, सम्बन्धी और धन-धान्य मनुष्य को कुछ समय तक मिलते हैं, क्योंकि इन सब का बिछड़ जाना अवश्यम्भावी है।

    Sanskrit Shlok 67

    सत्येनोत्पद्यते धर्मो दयादानैर्विवर्धते । 
    क्षमया स्थाप्यते धर्मः क्रोधलोभैर्विनश्यति ॥ -  महासुभाषितसंग्रह
    satyēnōtpadyatē dharmō dayādānairvivardhatē । 
    kṣamayā sthāpyatē dharmaḥ krōdhalōbhairvinaśyati ॥
    भावार्थ: धर्म सत्य से उत्पन्न होता है। दया और दानशीलता के माध्यम से यह बढ़ता है। क्षमाशीलता की भावना से यह स्थापित होता है। क्रोध और लालच के माध्यम से यह नष्ट हो जाता है। .
    Meaning: Dharma arises from Truth. Through compassion and offerings it grows. Through forbearance, it endures(remains in existence). Through anger and greed it disappears.

    Sanskrit Shlok 68

    बालादपि ग्रहीतव्यं युक्तमुक्तं मनीषिभिः ।
    रवेरविषये किं न प्रदीपस्य प्रकाशनम् ॥
    bālādapi grahītavyaṃ yuktamuktaṃ manīṣibhiḥ ।
    ravēraviṣayē kiṃ na pradīpasya prakāśanam ॥
    Meaning: Sensible words, if coming even from a child, should be received by mankind.Doesn't a lamp illuminate where the sun cannot? .
    भावार्थ: बच्चों के द्वारा भी कही गई सही बात विद्वानों को स्वीकार कर लेनी चाहिए। क्या सूर्य के अभाव में छोटा दिया प्रकाश नहीं करता?

    Sanskrit Shlok 69

    क्षुधा-तृष्टा-आशा कुटुम्बिन्या मयि जीवति न अन्यगा: ।
    तेषाम् आशा महासाध्वी कदाचित् मां न मुञ्चति ॥
    kṣudhā-tṛṣṭā-āśā kuṭumbinyā mayi jīvati na anyagā: ।
    tēṣām āśā mahāsādhvī kadācit māṃ na muñcati ॥
    Meaning: Hunger, Thirst and Desire are like man's three wives. Until he is alive these three will never leave him. Amongst all the three, Desire is the 'Maha Sadhvi' because she never leaves the man.
    भावार्थ: क्षुधा , तृष्णा और आशा ये तीनों मनुष्य की तीन पत्नियों के समान हैं , जो मृत्यु पर्यन्त उसका साथ छोड़ने वाली नहीं हैं ।  इन तीनों में आशा 'महासाध्वी' के समान है जो मनुष्य का साथ कभी नहीं छोड़ती ।

    Sanskrit Shlok 70

    नास्तीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
    यथा मैत्री च लोकेषु दानं च मधुरा च वाक्॥ -  मत्स्यपुराणम्
    nāstīdṛśaṃ saṃvananaṃ triṣu lōkēṣu kiñcana।
    yathā maitrī ca lōkēṣu dānaṃ ca madhurā ca vāk॥
    Meaning: THERE IS NO SUCH MEANS FOR WINNING OVER PEOPLE IN THE WORLD AS FRIENDSHIP, GIFTS AND SWEET SPEECH.
    भावार्थ: संसार में किसी को भी अनुकूल करने का ऐसा कोई साधन नहीं है जैसा कि मैत्री, लोगों को दान देना और मीठी वाणी हैं।

    Sanskrit Shlok 71

    सुखं शेते सत्यवक्ता सुखं शेते मितव्ययी I
    हितभुक् मितभुक् चैव तथैव विजितेन्द्रिय: IIचरकसंहिता
    sukhaṃ śētē satyavaktā sukhaṃ śētē mitavyayī ।
    hitabhuk mitabhuk caiva tathaiva vijitēndriya: ॥
    भावार्थ: सत्य बोलनेवाला , मर्यादित खर्चा करनेवाला , हितकारक पदार्थ जरूरी प्रमाण मे खानेवाला , तथा जिसने इन्द्रियोंपर विजय पाया है , वह चैन की नींद सोता है ।
    Meaning: One who speaks truth sleeps well, one who spends less sleeps well. One who eats nutritious food in limited quantity and one who has control over the mind and senses also gets peaceful sleep.

    Sanskrit Shlok 72

    शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात् परं सुखम्।
    न तृष्णायाः परो व्याधिः न च धर्मो दयापरः।। -  चाणक्यनीतिः
    śāntitulyaṃ tapō nāsti na santōṣāt paraṃ sukham।
    na tṛṣṇāyāḥ parō vyādhiḥ na ca dharmō dayāparaḥ।।
    भावार्थ: शान्ति के समान कोई तप नहीं है, संतोष से बढ़कर कोई सुख नहीं है, तृष्णा (लालच) से बड़ी कोई बीमारी नहीं है और दया से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।
    Meaning: There is no penance like peace, no happiness like contentment, no disease like lust and there is no Dharma like kindness.

    Sanskrit Shlok 73

    अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका।
    तृणैर्गुणत्वमापन्नैः बध्यन्ते मत्तदन्तिनः॥ -  हितोपदेशः, मित्रलाभः
    alpānāmapi vastūnāṃ saṃhatiḥ kāryasādhikā।
    tṛṇairguṇatvamāpannaiḥ badhyantē mattadantinaḥ॥
    भावार्थ: छोटी-छोटी वस्तुएँ जब मिल जाती हैं, तो उनसे बड़े-बड़े काम सिद्ध हो जाते हैं। जैसे रस्सी तिनको से बनती है और उससे शक्तिशाली हाथी भी बांधे जाते हैं।
    Meaning: Very small things when united can do great things, just as a rope made of small pieces of straws can bind even a giant elephant.

    Sanskrit Shlok 74

    त्यक्त्वा धर्मप्रदां वाचं परुषां योऽभ्युदीरयेत्।
    परित्यज्य फलं पक्वं भुङ्क्तेऽपक्वं विमूढधीः ।।
    tyaktvā dharmapradāṃ vācaṃ paruṣāṃ yō'bhyudīrayēt।
    parityajya phalaṃ pakvaṃ bhuṅktē'pakvaṃ vimūḍhadhīḥ ।।
    भावार्थ: जो धर्मप्रद वाणी को छोड़कर कठोर वाणी बोले, वह मूर्ख (मानो) पके हुए फल को छोड़कर कच्चा फल खाता है।
    Meaning: Ignoring, sweet & sane words, uttering harsh words is like eating unripe fruits when ripe fruits are available.

    Sanskrit Shlok 75

    अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
    चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्यायशोबलम् ॥ महाभारतम् 5/39/60
    abhivādanaśīlasya nityaṃ vṛddhōpasēvinaḥ।
    catvāri tasya vardhantē āyurvidyāyaśōbalam ॥
    भावार्थ: गुरुजनों का अभिवादन करने वाले तथा वृद्धजनों की सेवा करने वालों की चार वस्तुएँ निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होती हैं - आयु, विद्या, यश तथा बल।
    Meaning: One who respects the elders and serves them, is blessed with the increase in the span of life, learning, fame and strength.

    Sanskrit Shlok 76-100 | संस्कृत श्लोक ७६-१००

    Sanskrit Shlok 76

    यथा माता हि पुत्राणां कृते ददाति सर्वस्य।
    प्रकृतिरेव सर्वस्य कृते ददाति जीवनाम्।। 
    yathā mātā hi putrāṇāṃ kṛtē dadāti sarvasya।
    prakṛtirēva sarvasya kṛtē dadāti jīvanām।। 
    भावार्थ: जिस प्रकार एक माता अपने पुत्रों के पालन पोषण के लिए सब कुछ अर्पण कर देती है, उसी प्रकार प्रकृति ही एक ऐसी है जो समस्त जीवों के पोषण के लिए सब कुछ प्रदान करती है। 
    Meaning: Just as a mother surrenders everything for the upbringing of her sons, in the same way nature is the one which provides everything for the nourishment of all living beings.

    Sanskrit Shlok 77

    वृक्षे सीदन्पक्षी शाखाखंडनान्न बिभेति
    यतः सः शाखायां न स्वपक्षायोस्तु विश्वसिति
    vṛkṣē sīdanpakṣī śākhākhaṃḍanānna bibhēti।
    yataḥ saḥ śākhāyāṃ na svapakṣāyōstu viśvasiti॥
    Meaning: A bird sitting on a tree is never afraid of the branch breaking because her trust is not on the branch but on her own wings.
    भावार्थ: एक पेड़ पर बैठा पक्षी कभी शाखा के टूटने से नहीं डरता क्योंकि उसका भरोसा शाखा पर नहीं बल्कि अपने पंखों पर है।

    Sanskrit Shlok 78

    यः समः सर्वभूतेषु विरागी गतमत्सरः ।
    जितेन्द्रियः शुचिर्दक्षः सदाचार समन्वितः ॥
    yaḥ samaḥ sarvabhūtēṣu virāgī gatamatsaraḥ ।
    jitēndriyaḥ śucirdakṣaḥ sadācāra samanvitaḥ ॥
    भावार्थ: गुरु सब प्राणियों के प्रति वीतराग और मत्सर से रहित होते हैं । वे जीतेन्द्रिय, पवित्र, दक्ष और सदाचारी होते हैं ।
    Meaning: (Guru is the one) Who is equal to all beings, without any expectations and beyond jealousy, one who has conquered his sense organs, taint-less, diligent and virtuous.

    Sanskrit Shlok 79

    सन्तोषः परमो लाभः सत्सङ्गः परमा गतिः ।
    विचारः परमं ज्ञानं शमो हि परमं सुखम् ॥
    santōṣaḥ paramō lābhaḥ satsaṅgaḥ paramā gatiḥ ।
    vicāraḥ paramaṃ jñānaṃ śamō hi paramaṃ sukham ॥
    Meaning: Contentment is the highest gain, Good Company the highest course, Enquiry the highest wisdom, and Peace the highest enjoyment.
    भावार्थ: संतोष ही परम लाभ है सत्संग ही परम गति है सद्विचार ही परम ज्ञान है एवं शांति ही परम सुख है।

    Sanskrit Shlok 80

    मा बिभीहि देवात्।
    किन्तु बिभीहि कर्मणः।
    क्षाम्यति देवः नतु कर्म।
    mā bibhīhi dēvāt।
    kintu bibhīhi karmaṇaḥ।
    kṣāmyati dēvaḥ natu karma।
    Meaning : DON'T FEAR GOD FEAR KARMA.GOD FORGIVES, KARMA DOESN'T.
    भावार्थ: ईश्वर से नही अपने कर्म से डरना चाहिए क्योकि ईश्वर क्षमा कर देते है परन्तु कर्म नही ।

    Sanskrit Shlok 81

    रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः ।
    विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा किंशुका इव ॥
    rūpayauvanasampannā viśālakulasambhavāḥ ।
    vidyāhīnā na śōbhantē nirgandhā kiṃśukā iva ॥
    Meaning : They who have charm and youthfulness, born in great family, yet without education they do not shine, as the ‘kimshuka’ which have beauty but no fragrance.
    भावार्थ: रूप और यौवन से सम्पन्न तथा कुलीन परिवार में जन्म लेने पर भी विद्याहीन पुरुष पलाश के फूल के समान है जो सुन्दर तो है लेकिन सुगन्ध रहित है।

    Sanskrit Shlok 82

    व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखं। 
    आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम् ||
    vyāyāmāt labhatē svāsthyaṃ dīrghāyuṣyaṃ balaṃ sukhaṃ। 
    ārōgyaṃ paramaṃ bhāgyaṃ svāsthyaṃ sarvārthasādhanam ||
    भावार्थ: व्यायाम से स्वास्थ्य, लम्बी आयु, बल और सुख की प्राप्ति होती है। निरोगी होना परम भाग्य है और स्वास्थ्य से अन्य सभी कार्य सिद्ध होते हैं ।
    Meaning : Exercise results in good health, long life, strength and happiness. Good health is the greatest blessing. Health is means of everything.

    Sanskrit Shlok 83

    ज्येष्ठत्वं जन्मना नैव गुणै: ज्येष्ठत्वम् उच्यते ।
    गुणात् गुरुत्वम् आयाति दुग्धं दधि घृतं क्रमात्।। -  चाणक्य नीति 
    jyēṣṭhatvaṃ janmanā naiva guṇai: jyēṣṭhatvam ucyatē ।
    guṇāt gurutvam āyāti dugdhaṃ dadhi ghṛtaṃ kramāt।।
    Meaning : Greatness doesn't come by birth. Greatness is decided by the qualities of a person. As the heaviness gets increased from milk to curd and from curd to ghee.
    भावार्थ: महानता मनुष्य को मात्र जन्म लेने से नहीं मिलती है। महानता मनुष्य को उसके गुणों से प्राप्त होती है। जैसे दुग्ध से गुरूतर होकर क्रमश: दधि और पुन: दधि से घी बनता है ।

    Sanskrit Shlok 84

    अजरामरवत्प्राज्ञो विद्यामर्थं च साधयेत्।
    गृहीत इव केशेषुमृत्युना धर्ममाचरेत्॥
    ajarāmaravatprājñō vidyāmarthaṃ ca sādhayēt।
    gṛhīta iva kēśēṣumṛtyunā dharmamācarēt॥
    Meaning: The wise man acquires knowldge and wealth as if he is never going to die. And he practices relegion as if he is tightly held in his hair by death.
    भावार्थ: बूढापा और मृत्यु नहीं आयेंगे ऐसा समजकर विद्या और धन का चिंतन करना चाहिए । पर मृत्यु ने हमें बाल से जकड रखा है, ऐसा समजकर धर्म का आचरण करना चाहिए ।

    Sanskrit Shlok 85

    न हि कश्चित्विजानाति किं कस्य श्वो भविष्यति ।
    अतः श्वः करणीयानि कुर्यादद्यैव बुद्धिमान्॥ 
    na hi kaścitvijānāti kiṃ kasya śvō bhaviṣyati ।
    ataḥ śvaḥ karaṇīyāni kuryādadyaiva buddhimān॥
    Meaning: No one knows what will happen to whom tomorrow. So a wise man should do all of tomorrow’s tasks today.
    भावार्थ: कल क्या होगा यह कोई नहीं जानता है इसलिए कल के करने योग्य कार्य को आज कर लेने वाला ही बुद्धिमान है।

    Sanskrit Shlok 86

    नात्मार्थं नाऽपि कामार्थं अतभूत दयां प्रतिः।
    वतर्ते यश्चिकित्सायां स सर्वमति वर्तते॥ -  चरक संहिता
    nātmārthaṃ nā'pi kāmārthaṃ atabhūta dayāṃ pratiḥ।
    vatartē yaścikitsāyāṃ sa sarvamati vartatē॥ 
    Meaning: One who is not in the sense and desire, but on pratinamatr, who is inclined to healing in terms of compassion, is the best physician.
    भावार्थ: जो अर्थ तथा कामना के लिए नहीं, वरन् प्राणिमात्र पर दया की दृष्टि से चिकित्सा में प्रवृत्त होता है, वही वैद्य सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक होता है।

    Sanskrit Shlok 87

    विरला जानन्ति गुणान्विरलाः कुर्वन्ति निर्धने स्नेहम् ।
    विरलाः परकार्यरताः परदुःखेनापि दुःखिता विरलाः ॥
    viralā jānanti guṇānviralāḥ kurvanti nirdhanē snēham ।
    viralāḥ parakāryaratāḥ paraduḥkhēnāpi duḥkhitā viralāḥ ॥
    Meaning : Those who know the virtues are less, those who love the poor, those who work in the work and those who are grieved by the alien sorrow are less.
    भावार्थ: गुणोंको जाननेवाले कम होते हैं, निर्धन को स्नेह करनेवाले, परकार्य में रत और पराये दुःख से दुःखी होनेवाले भी कम ही होते हैं ।

    Sanskrit Shlok 88

    तर्कविहीनो वैद्यः लक्षण हीनश्च पण्डितो लोके ।
    भावविहीनो धर्मो नूनं हस्यन्ते त्रीण्यपि ॥
    tarkavihīnō vaidyaḥ lakṣaṇa hīnaśca paṇḍitō lōkē ।
    bhāvavihīnō dharmō nūnaṃ hasyantē trīṇyapi ॥
    Meaning : Irrational practitioners, symptomatic pundits, and faithless religions - they must become reclusive in the world.
    भावार्थ: तर्कविहीन वैद्य, लक्षणविहीन पंडित, और भावरहित धर्म – ये अवश्य हि जगत में हाँसीपात्र बनते हैं ।

    Sanskrit Shlok 89

    अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । 
    यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥
    annādbhavanti bhūtāni parjanyādannasambhavaḥ । 
    yajñādbhavati parjanyō yajñaḥ karmasamudbhavaḥ ॥
    Meaning : Whole beings are born from food, food originates from rain, rain comes from sacrifice and yajna is to be produced by prescribed actions.
    भावार्थ: सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है।

    Sanskrit Shlok  90

    क्षत्रियो हि प्रजारक्षन शस्त्रपाणिः प्रदण्डयन ।
    निर्जित्य परसैन्यादि क्षितिं धर्मण पालयेत ॥
    kṣatriyō hi prajārakṣana śastrapāṇiḥ pradaṇḍayana ।
    nirjitya parasainyādi kṣitiṃ dharmaṇa pālayēta ॥
    Meaning : The religion of the Kshatriya is to protect the citizens from all tribulations. That is why he has to commit violence to maintain peace and order. Therefore, he should win the soldiers of enemy kings and rule the world rightiously. "
    भावार्थ:  क्षत्रिय का धर्म है कि वह सभी क्लेशों से नागरिकों की रक्षा करे इसीलिए उसे शान्ति तथा व्यवस्था बनाये रखने के लिए हिंसा करनी पड़ती है । अतः उसे शत्रु राजाओं के सैनिकों को जीत कर धर्मपूर्वक संसार पर राज्य करना चाहिए ।

    Sanskrit Shlok 91

    यदाचरित कल्याणि ! शुभं वा यदि वाऽशुभम् ।
    तदेव लभते भद्रे! कर्त्ता कर्मजमात्मनः ॥    -  Valmiki Ramayan
    yadācarita kalyāṇi ! śubhaṃ vā yadi vā'śubham ।
    tadēva labhatē bhadrē! karttā karmajamātmanaḥ ॥
    Meaning : Whatever man does good or bad, he gets the same result. The Karta (doer) must bear the fruits of his karma (doings)
    भावार्थ: मनुष्य जैसा भी अच्छा या बुरा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है । कर्त्ता को अपने कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है ।

    Sanskrit Shlok 92

    कस्यापि नास्ति सम्बन्धी समयो धरणीतले।
    समयमवलोक्यैव सम्बधिनो भवन्ति च ।।
    kasyāpi nāsti sambandhī samayō dharaṇītalē।
    samayamavalōkyaiva sambadhinō bhavanti ca ।।
    Meaning : In the world, time is not anyone's relative but everyone make relatives by seeing their time. 
    भावार्थ: जगत मे समय किसी का सम्बन्धी नहि होता, सब समय देख कर हि सम्बन्धी बनाते है ।

    Sanskrit Shlok 93

    ज्ञानं यस्य समीपे स्यात् मदस्तस्मिन्न विद्यते।
    यस्य पार्श्वे भवेत् गर्व:ज्ञानं तस्य कुतो भवेत्।।
    jñānaṃ yasya samīpē syāt madastasminna vidyatē।
    yasya pārśvē bhavēt garva:jñānaṃ tasya kutō bhavēt।।
    Meaning : Who has knowledge then He cannot have arrogance. one who has ego then He doesn't have the knowledge.
    भावार्थ: जिसके पास ज्ञान है। वह अहंकार नहीं रख सकता। उसके पास अहंकार है। उसे कहां से ज्ञान है?

    Sanskrit Shlok 94

    द्यूतं पुस्तकवाद्ये च नाटकेषु च सक्तिता ।
    स्त्रियस्तन्द्रा च निन्द्रा च विद्याविघ्नकराणि षट् ॥
    dyūtaṃ pustakavādyē ca nāṭakēṣu ca saktitā ।
    striyastandrā ca nindrā ca vidyāvighnakarāṇi ṣaṭ ॥
    Meaning : Gambling, instrumentalism, attachment to theatrical (narrative/film),Attachment towards opposite sex, laziness and sleep - all these are six obstacle in learning.
    भावार्थ: जुआ, वाद्य, नाट्य (कथा/फिल्म) में आसक्ति, स्त्री (या पुरुष), तंद्रा, और निंद्रा – ये छे विद्या में विघ्नरुप होते हैं ।

    Sanskrit Shlok 95

    नवनीतं घृतं दुग्धं दधि तक्रं च पञ्चमम् ।
    सर्वमेककुलाज्जाता मूल्यं सर्वस्य वै पृथक् ॥
    navanītaṃ ghṛtaṃ dugdhaṃ dadhi takraṃ ca pañcamam ।
    sarvamēkakulājjātā mūlyaṃ sarvasya vai pṛthak ॥
    Meaning: Milk, yogurt, butter, ghee and fifth mixture are all born in the same family, yet they all have different prices (superiority depends upon karm, irrespective of where you belong from).
    भावार्थ: दूध,दही,मखन,घी और पांचवीं छाछ, ये सब एक ही कुल मे जन्मे है फिर भी सबकी कीमत अलग अलग है (श्रेष्ठता कुल से नहीं कर्म से प्राप्त होती है)

    Sanskrit Shlok 96

    सुवर्णरौप्य माणिक्यवसनैरपि पुरिता ।
    तथापि प्रार्थयन्त्येव कृषकान् भक्त तृष्ण या ॥
    suvarṇaraupya māṇikyavasanairapi puritā ।
    tathāpi prārthayantyēva kṛṣakān bhakta tṛṣṇa yā ॥
    Meaning: Even after being full of gold, silver, rubies and clothes, humans have to depend on the farmer for food.
    भावार्थ: सोना,चांदी,माणिक्य एवं वस्त्रों से पूर्ण होने पर भी मनुष्यों को भोजन के आवश्यकतावश किसान पर निर्भर रहना पड़ता हैं ।

    Sanskrit Shlok 97

    करिष्यामि करिष्यामि करिष्यामीति चिन्तया।
    मरिष्यामि मरिष्यामि मरिष्यामीति विस्मृतम्॥
    kariṣyāmi kariṣyāmi kariṣyāmīti cintayā
    mariṣyāmi mariṣyāmi mariṣyāmīti vismṛtam ॥
    Meaning: I will do this work, I will do that work or I have to do that work, while worrying like this, a person forgets that his death can happen at any moment.
    भावार्थ: मैं यह कार्य करूंगा ,वह कार्य करूंगा या मुझे वह कार्य करना है , इस प्रकार की चिन्तायें करते करते मनुष्य यह भी भूल जाता है कि उसकी मृत्यु किसी भी क्षण हो सकती है ।

    Sanskrit Shlok 98

    रथः शरीरं पुरुषस्य राजत्रात्मा नियन्तेन्द्रियाण्यस्य चाश्चाः। 
    तैरप्रमत्तः कुशली सदश्वैर्दान्तैः सुखं याति रथीव धीरः ॥
    rathaḥ śarīraṃ puruṣasya rājatrātmā niyantēndriyāṇyasya cāścāḥ। 
    tairapramattaḥ kuśalī sadaśvairdāntaiḥ sukhaṃ yāti rathīva dhīraḥ ॥
    Meaning: The human-body is the chariot, the soul (intellect) is its charioteer, the senses are its horses. The person who holds them carefully, cleverly and wisely travels happily in the world like a superior Rathwan.
    भावार्थ:  यह मानव -शरीर रथ है ,आत्मा (बुद्धि ) इसका सारथी है ,इंद्रियाँ इसके घोड़े हैं। जो व्यक्ति सावधानी ,चतुराई और बुद्धिमानी से इनको वश में रखता है वह श्रेष्ठ रथवान की भांति संसार में सुखपूर्वक यात्रा करता है।

    Sanskrit Shlok 99

    इन्द्रियैरिन्द्रियार्थेषु वर्तमानैरनिग्रहैः।
    तैरयं ताप्यते लोको नक्षत्राणि ग्रहैरिव
    indriyairindriyārthēṣu vartamānairanigrahaiḥ।
    tairayaṃ tāpyatē lōkō nakṣatrāṇi grahairiva॥
    Meaning: if the senses are not in control then they gets attached to the subjects of the senses. by this a person becomes of no value as all planets in front of sun.
    भावार्थ: इंद्रियाँ यदि वश में न हो तो ये विषय -भोगों में लिप्त हो जाती हैं। उससे मनुष्य उसी प्रकार तुच्छ हो जाता है ,जैसे सूर्य के आगे सभी ग्रह।

    Sanskrit Shlok 100

    माता च कमला देवी पिता देवो जनार्दनः। 
    बान्धवा विष्णुभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम्॥
    mātā ca kamalā dēvī pitā dēvō janārdanaḥ। 
    bāndhavā viṣṇubhaktāśca svadēśō bhuvanatrayam॥
    भावार्थ : जिस मनुष्य की माँ लक्ष्मी के समान है, पिता विष्णु के समान है और भाइ - बन्धु विष्णु के भक्त है, उसके लिए अपना घर ही तीनों लोकों के समान है ।
    Meaning: If Some person's mother is like godess lakshmi, father is like god vishnu and relatives are like devotees of vishnu then his home is universe.

    मित्रो हम आशा करते है की हमारे द्वारा प्रदान किये गये 100 संस्कृत श्लोक आपको पसंद आये होंगे एवं इनमे निहित ज्ञान से आपका ज्ञान वर्धन हुआ होगा ।
    Thanks for reading 100 Sanskrit Shlok with meaning, we hope you liked them and got some knowledge from these Sanskrit Shlok. 

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